स्वेट मार्डेन अंकल की क्लास
सफलता की रोड़ पर उत्साह की सवारी जरूरी है.
शेक्सपियर दादा कहीं लिखते है -"जिस श्रम से हमें आनंद की प्राप्ति होती है , वह हमारी व्याधियों के लिए अमृततुल्य औषधि है , उससे हमारी वेदना शांत होती है."
दरअसल उत्साहहीन होकर कोई भी कार्य करना उस कार्य को कठिन बना देता है . मनुष्य में उत्साह न हो तो उसकी मानसिक शक्तियों का कार्यो में कोई सहयोग नहीं मिल सकता .हाथ कुछ कार्य कम करता है तो मन कहीं और भटकता है . कुछ देर शरीर के विभिन्न अंग ही परस्पर जूझते रहते है और इस तरह जो कम कुछ मिनटों में हो जाना चाहिए था वह घंटों में खिंच जाता है.इस पर भी कम ढंग से नहीं हो पाता है.उत्साह वो आग है , जो हमारे कार्य-रूपी इंजन को चलाने के लिए भाप तैयार करती है.
लन्दन के वेस्टमिन्स्टर गिरजे में एक कब्र है, उसकी शिला पर लिखा है -"इसके नीचे इस गिरजाघर को और इस नगर को बनानेवाला क्रिस्टोफ़र रेन विश्राम कर रहा है .वह 90 वर्ष तक जनता कि भलाई के लिए जीवित रहा . यदि आप उसका स्मारक देखना चाहते हो तो अपने चारों ओर देखो ."
लन्दन में जहां भी आप जायेंगे आपको रेन की कला का नमूना देखने को मिल जायेगा . अब एक रहस्य ,रेन ने कहीं से किसी प्रकार की कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की थी . इसके बाद भी उसने पचपन गिरिजाघर और छत्तीस बड़े-बड़े हॉल और सभागार निर्मित किये है.उसकी कला कौशल का नमूना हैम्पटन और कैसिंग्टन के महलों,टेम्पल बार ,डेटलेन नाट्यघर और रॉयल एक्सचेंज के भवनों में स्पष्ट दिखाई देता है .उसने पूरे पैंतीस वर्ष खर्च करके सेंटपॉल गिरिजाघर का निर्माण किया .यह उसकी सर्वोत्तम कृति है.उसकी सफलता का रहस्य उसका उत्साह था ,जिससे उसे बल प्राप्त होता था .उत्साह ही उसका चिर साथी और सहायक था .
उत्साह से दीप्त मनुष्य किसी सूर्य का भी सामना कर सकता है . सिकंदर तब युवक ही तो था , जब उसने यूरोपियन सभ्यता को नष्ट करने वालों की धज्जियाँ उड़ा दी थी .नेपोलियन ने कुल पच्चीस वर्ष की उम्र में ही इटली पर विजय प्राप्त कर ली थी . सेम्युअल ने 20 वर्ष की अवस्था में ही रोमन साम्राज्य की स्थापना कर दी थी .न्यूटन इक्कीस वर्ष का भी नहीं था जब उसने अपने सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार किये थे,लूथर इक्कीस वर्ष की अवस्था में ही महान सुधारक बन गया था . इक्कीस वर्ष के चेत्र्स्तान की प्रतिभा का मुकाबला कोई अंग्रेज कवी नहीं कर सका था .विक्टर ह्यूगो ने अपना एक नाटक केवल पंद्रह वर्ष की आयु में ही लिख डाला था .उसने इतनी कम उम्र में तीन महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त किये थे .
गेलिलियो ने जब अपनी पुस्तक 'गति के नियम' की रचना की थी तो उसकी उम्र लगभग सत्तर वर्ष थी .जेम्सवाट ने 85 वर्ष की आयु में जर्मन भाषा सीखी थी .हम्बोल्ट ने 'काम्सास' नामक ग्रन्थ 90 वर्ष की आयु में समाप्त किया था .पैंतीस वर्ष की आयु में बर्क ने संसद में अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा दिया था .चालीस वर्ष तक गुमनाम रहने के वाला ग्रांट व्यालीस वर्ष की आयु में एक प्रसिद्ध सेनापति बन गया था .एल्वित ने जब कालेज जाने की सोची तब वह 23 वर्ष का था और तीस वर्ष तक वह ग्रजुएट हो गया और उसके पास के कारखाने ने दक्षिणी राज्यों के लिए उज्जवल रस्ते खोल दिए थे.जर्मनी के भाग्य का निर्माण करने वाले 80 वर्षीय विस्मार्क में कितनी अद्भुत शक्ति थी.महाकवि लोंग्फेलो,टेनिसन,ने अपनी उत्तम रचनाएँ 70 वर्ष की आयु के आस-पास ही लिखीं थी.
अतः उत्साह को कभी मंद न होने दें ,ये तो सफलता विरत सफलता के लिए अति आवश्यक ईंधन है.इसकी कमी से ही हमारी गति में शिथिलता आ जाती है.तो उत्साह के प्रकाश में जीवन की यात्रा करते रहें .यदि आप ऐसा करते है तो तो कभी थकावट न अनुभव होगी .और असफलता दुखदाई प्रतीत न होगी बल्कि एक प्रेरणा लगेगी .
दोस्तों ,आज के लिए इतना ही , खुश रहिये उत्साहित रहिये अगली पोस्ट में फिर होगी एसे ही एक नए विषय पर आपसे बात ,तबतक उत्साह का उपयोग कर परिणाम मेरे साथ भी शेयर करें जिससे में उससे औरो का उत्साह वर्धन कर सकूं.और किसी विषय पर मेरी पोस्ट चाहिए तो वह विषय मुझे बताएं में तथ्य परक सूचनाये आप तक पंहुचाऊँगा ये वादा है आपसे .
आपका
मनोज सिंह जादौन
[मेरी एक संवेदनशील कहानी :-ठिठुरन पढ़े उपरोक्त लिंक पर :-http://www.rachanakar.org/2013/12/blog-post_1828.html
[मेरी एक संवेदनशील कहानी :-ठिठुरन पढ़े उपरोक्त लिंक पर :-http://www.rachanakar.org/2013/12/blog-post_1828.html

एक अच्छी रचना को भी प्रशंसा की जरूरत होती है.और वैसे भी ये मेरी नहीं स्वेट मार्डेन की रचना है.
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