शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

अथ श्री शिरोमणि कथा

 शिरोमणि उपाध्याय यूँ तो खासा पढालिखा व्यावहारिक लड़का है, लेकिन लोग उसकी एक कमी से परेशान है, उसे अपने बारे में कवि होने का तगड़ा भ्रम है. वह लोगों को शहीद कर देने कि हद तक कविताएँ,गीत,शायरी,गज़ल, तुकबंदी आदि दाग सकता है. में खुद कईबार उसके चंगुल में फंसने से बाल-बाल बचा हूं.आप किसी भी विषय में बात कीजिये पन्द्रह मिनिट बाद ही वह बातचीत कि दिशा अपने हुनर की ओर मोड़ देता है . आप कब उसके अंटे में फँस गए आपको पता ही नहीं चलता ,और अब आप आसानी से उसके जाल से बाहर नहीं निकल सकते थे. जब हमें किसीसे बैर निकलना होता तो हम उसे शिरोमणि के चक्कर में डाल देते फिर दूर खड़े होकर उस बन्दे कि बेबसी पर मुस्कुराते.
                 “ हिक़ारत ही नसीब है मेरा,जैसे गरीब के झोपड़े की बुझी बत्ती.मेरी गज़ल सुनता न गली का कुत्ता और न कुत्ती.” अजी साहब ये तो नमूना भर है बल्कि नमूनी कहना चाहिए क्योकि नमूना लिखने बैठूंगा तो आठ-दस पन्ने तो कम से कम भर जायेंगे .अब आप ही विचार कर बताइए कि किस हद तक भयंकर जीव है शिरोमणि उपाध्याय. हालाँकि हाल ही के विधानसभा चुनावों के बाद शिरोमणि की ख्याति बढ़ी है, वैसे ये भी एक रोचक प्रसंग है, दरअसल इन चुनावों में सत्ताधारी विधायक ने शिरोमणि से एक पैकेज डील कि . डील ये थी कि विरोधी नेता की सभाओं में शिरोमणि जायेगा और नेताजी के भाषण सुनने आये लोगों को कविता सुनाने कि कोशिश करेगा. चाल चल गई ,जैसे ही शिरोमणि ने कविता पाठ शुरू किया भीड़ में भगदड़ मच गई . बेचारे नेताजी को अपने पचपन कार्यकर्ता और बारह व्यवस्थापकों के सामने ही भाषण देना पड़ा ,हाँ शिरोमणि को भी सज़ा स्वरूप पूरा भाषण सुनना पड़ा. अगली सभा में चूँकि नेताजी के भी पापा नेताजी कि सभा होने वाली थी सो शिरोमणि को रोकने के लिए कोने-कोने पर कार्यकर्ताओं को तैनात किया गया .पर शिरोमणि तो फिर शिरोमणि था भीड़ को देख कर तो उसकी कविताये छूट ही पड़ती थी, जब कार्यकर्ताओं ने उसे रोकने कि कोशिश कि तो शिरोमणि को तो जैसे दौरा ही पड़ गया प्रति आधे मिनट में बयालीस कविता कि दर से उसने जब कविता पाठ शुरू किया तो उसे रोकने वाले कार्यकर्ताओं ने अपनी प्राथमिक सदस्यता से तत्काल स्तीफ़ा दे दिया और अपने कान बचा कर भाग खड़े हुए.तब पापा नेताजी के सुरक्षा कर्मियों ने मोर्चा संभाला जिनकी औटोमटिक बन्दूको को तनी देख शिरोमणि का हाजमा ख़राब हो गया और उसके पघसंग्रह ने बारह बाई बारह के फर्स क्षेत्र को गन्दा कर दिया जिसकी असह्य दुर्गन्ध से एक बेचारे सुरक्षाकर्मी का तो नर्वस ब्रेकडाउन हो गया बाकियों का उल्टियाँ कर-कर के बुरा हाल हो गया. शिरोमणि को कुछ नहीं हुआ क्योंकि वह तो तुरंत ही बेहोश ही गया था. नेताजी कि इस निरीह प्राणी पर अत्याचार कि तीव्र भर्तस्ना हुई .इस सबका सत्तारूढ़ विधायक को फायदा मिला ,वे चुनाव जीत गए .शिरोमणि फिर वहीँ आ गए .
                       वैसे हमारा छोटा सा नगर हमेशा से खुशहाल रहा है ,छोटी-मोटी विपत्तियों  को हंस-हंसकर सह लेते हैं यहाँ के लोग.लेकिन जब से शिरोमणि कविताय गया है शहर का बड़ा हिस्सा दहशत में रहता है कि कब कहीं से शिरोमणि आ जायेगा और कोई न कोई पहचान निकल कर कवितायेँ सुनाने लग जायेगा. मुझे तो लोग आसानी से डरा देते है “वो देखो शिरोमणि आगया “ . शिरोमणि के घर में कुलजमा साढ़े चार जाने हैं .उसकी माँ ,बड़ा भाई ,भाभी और पांच साल का भतीजा .उसके पिताजी दो साल पहले देह त्याग चुके थे ,तबसे शिरोमणि अपने घर में कवितापाठ नहीं करता है . हाँ अपने मित्रों पर वो अधिकार पूर्वक ये अत्याचार करता है बिना ये विचार किये कि इनके भी बीबी –बच्चे हैं . मैंने गौर किया है इन दिनों उसमें एक स्वाभाविक क़िस्म कि कवियोचित निर्लज्जता और उग्रता का भी विकास हुआ है ,अब ये उन नेताजी कि संगत का असर है या उसकी अपनी तपस्या का परिणाम ये स्पष्ट नहीं हो सका .उसका नया रूप अभी कुछ दिन पहले ही सामने आया , मैं ये प्रसंग आपको सिलसिलेवार सुनाऊँगा तो आप बेहतर समझ सकेंगे .दरअसल ये पिछले रविवार कि बात है , शाम के करीब छः बज रहे होंगे अब चूंकि दिसंबर में छः बजे अँधेरा भी हो जाता है और ठण्ड भी .तो मैं, बनबारी पंडितजी,अशोक बाबू और राधेश्याम वकीलसाब स्टे्टबैंक के सामने वाली चाय कि दूकान पर चाय पी रहे थे.मैं,बनबारी पंडितजी और अशोक बाबू तो खैर लगभग नियमित रूप से यहाँ आया करते थे पर राधेश्याम बकीलसाब पिछले कुछ सालों से जबलपुर शिफ्ट हो गए थे. वकालात तो उनकी न यहाँ चलती थी न जबलपुर में, वो तो ससुर कुछ बीमार से रहते थे उनके कोई बेटा न था ,बस दोनों दामादों को ही बेटा मान लिया था .बड़ा दामाद तो शुरू से ही जबलपुर में रहता था जब से ससुर ज्यादा बीमार हुए इनकी पत्नी भी जबलपुर शिफ्ट होने पर ज़ोर देने लगीं ,आख़िर सवाल बीच शहर में बने सत्तर बाई पैंतीस के मकान और गाँव कि साढ़े बाईस बीघा जमीन का जो था. सो निश्चिन्त भविष्य ने वकील साब में साहित्यिक रुचियां भी विकसित कर दीं थी ,उन्हीं का बखान वे पिछले डेढ़ घंटे से कर रहे थे ,और हम तीनों कि तो मेजवान कि सी हैसीयत हो गयी थी सो जबरन मुस्कुराते हुए सुन रहे थे [जैसे एक शिरोमणि काफी नहीं था ].तभी एक अवसर कि तरह सामने से शिरोमणि आता दिखा मुझे ,उसे देखकर हम तीनो [मेरे,बनबारी पंडितजी और अशोकबाबू]के मन में राधेश्याम वकीलसाब से बदला लेने की बड़ी तीव्र इच्छा बलवती हुई और एक षडयंत्र के तहत हमने अपनी उपस्थिति मुखर कर दी ताकी शिरोमणि भूल से भी हमें अनदेखा न कर दे. किसी मुंहमांगी मुराद कि तरह शिरोमणि हमारी ओर आगया .हालांकि वह ये समझने कि असफल कोशिश ज़रूर कर रहा था कि आज हम लोग अपनी पृकृति के विरुद्ध आचरण क्यों कर रहे थे ,हमें तो अबतक यहाँ से हवा हो चुकना चाहिए था .खैर हमने बड़ी गर्मजोशी से उसके किये एक चाय का आर्डर दिया तो चाय वाला भी हमें मुंह खोलकर टापने लगा ,पर अब ये समय हमारी योजना के कार्यान्वन का था सो हमने राधेश्याम वकीलसाब का परिचय शिरोमणि से करवाया एक साहित्यप्रेमी के रूप में .इस दौरान मैंने शिरोमणि कि आँखों में एक वहसी चमक कोंधती देखी .अब हमने एक-एक कर के वहां से निकलना शुरू किया और पांच मिनट में ही मैं,बनबारी पंडितजी और अशोक बाबू वहां से निकल गए राधेश्याम वकीलसाब को शिरोमणि के हवाले करके .दो गली दूर हम लोग एक दूसरी चाय की दुकान पर खड़े हो गये और ये अंदाजा लगाने कि कोशिश करने लगे कि अब राधेश्याम वकीलसाब किस हाल में होंगे .लगभग बीस मिनिट बाद ही वकील साब बदहवास  से भागते हुए उसी ओर आ रहे थे . ऐसा लग रहा था जैसे अभी - अभी किसी से [शायद शिरोमणि से ]गुत्थम-गुत्था हुए है , लगता है  हालत ज्यादा ही संजीदा हो लिए थे . "अबे किस जनम का बदला लिया है तुम लोगों ने मुझसे ,किस पागल के चक्कर में फंसा दिया ".हालाँकि वकील साब कि हालत गंभीर थी ,पर क्या हुआ होगा उसकी कल्पना कर के हमारी हंसी ही नहीं रुक रही थी .तभी हमें शिरोमणि हमारी ही ओर आता दिखा ,हमारी सिट्टी-पिट्टी  गुम हो गयी ,जिसको जहां रास्ता दिखा उस ओर भाग लिया .                                  
लेखक :-मनोज सिंह जादौन
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