मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

मुंबई,और क्या !

एक अकेला इस शहर में ,रात में और दोपहर में ,आब-ओ-दाना ढूँढता है,आशियाना ढूँढता है.
गुलज़ार साहब 

                                                                मरीन ड्राइव,मुंबई
                                                              गिरगांव चौपाटी,मुंबई
                                                           सी व्यू ,नरीमन पॉइंट ,मुंबई
                                                        मरीन ड्राइव ,मुंबई 

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

अथ श्री शिरोमणि कथा

 शिरोमणि उपाध्याय यूँ तो खासा पढालिखा व्यावहारिक लड़का है, लेकिन लोग उसकी एक कमी से परेशान है, उसे अपने बारे में कवि होने का तगड़ा भ्रम है. वह लोगों को शहीद कर देने कि हद तक कविताएँ,गीत,शायरी,गज़ल, तुकबंदी आदि दाग सकता है. में खुद कईबार उसके चंगुल में फंसने से बाल-बाल बचा हूं.आप किसी भी विषय में बात कीजिये पन्द्रह मिनिट बाद ही वह बातचीत कि दिशा अपने हुनर की ओर मोड़ देता है . आप कब उसके अंटे में फँस गए आपको पता ही नहीं चलता ,और अब आप आसानी से उसके जाल से बाहर नहीं निकल सकते थे. जब हमें किसीसे बैर निकलना होता तो हम उसे शिरोमणि के चक्कर में डाल देते फिर दूर खड़े होकर उस बन्दे कि बेबसी पर मुस्कुराते.
                 “ हिक़ारत ही नसीब है मेरा,जैसे गरीब के झोपड़े की बुझी बत्ती.मेरी गज़ल सुनता न गली का कुत्ता और न कुत्ती.” अजी साहब ये तो नमूना भर है बल्कि नमूनी कहना चाहिए क्योकि नमूना लिखने बैठूंगा तो आठ-दस पन्ने तो कम से कम भर जायेंगे .अब आप ही विचार कर बताइए कि किस हद तक भयंकर जीव है शिरोमणि उपाध्याय. हालाँकि हाल ही के विधानसभा चुनावों के बाद शिरोमणि की ख्याति बढ़ी है, वैसे ये भी एक रोचक प्रसंग है, दरअसल इन चुनावों में सत्ताधारी विधायक ने शिरोमणि से एक पैकेज डील कि . डील ये थी कि विरोधी नेता की सभाओं में शिरोमणि जायेगा और नेताजी के भाषण सुनने आये लोगों को कविता सुनाने कि कोशिश करेगा. चाल चल गई ,जैसे ही शिरोमणि ने कविता पाठ शुरू किया भीड़ में भगदड़ मच गई . बेचारे नेताजी को अपने पचपन कार्यकर्ता और बारह व्यवस्थापकों के सामने ही भाषण देना पड़ा ,हाँ शिरोमणि को भी सज़ा स्वरूप पूरा भाषण सुनना पड़ा. अगली सभा में चूँकि नेताजी के भी पापा नेताजी कि सभा होने वाली थी सो शिरोमणि को रोकने के लिए कोने-कोने पर कार्यकर्ताओं को तैनात किया गया .पर शिरोमणि तो फिर शिरोमणि था भीड़ को देख कर तो उसकी कविताये छूट ही पड़ती थी, जब कार्यकर्ताओं ने उसे रोकने कि कोशिश कि तो शिरोमणि को तो जैसे दौरा ही पड़ गया प्रति आधे मिनट में बयालीस कविता कि दर से उसने जब कविता पाठ शुरू किया तो उसे रोकने वाले कार्यकर्ताओं ने अपनी प्राथमिक सदस्यता से तत्काल स्तीफ़ा दे दिया और अपने कान बचा कर भाग खड़े हुए.तब पापा नेताजी के सुरक्षा कर्मियों ने मोर्चा संभाला जिनकी औटोमटिक बन्दूको को तनी देख शिरोमणि का हाजमा ख़राब हो गया और उसके पघसंग्रह ने बारह बाई बारह के फर्स क्षेत्र को गन्दा कर दिया जिसकी असह्य दुर्गन्ध से एक बेचारे सुरक्षाकर्मी का तो नर्वस ब्रेकडाउन हो गया बाकियों का उल्टियाँ कर-कर के बुरा हाल हो गया. शिरोमणि को कुछ नहीं हुआ क्योंकि वह तो तुरंत ही बेहोश ही गया था. नेताजी कि इस निरीह प्राणी पर अत्याचार कि तीव्र भर्तस्ना हुई .इस सबका सत्तारूढ़ विधायक को फायदा मिला ,वे चुनाव जीत गए .शिरोमणि फिर वहीँ आ गए .
                       वैसे हमारा छोटा सा नगर हमेशा से खुशहाल रहा है ,छोटी-मोटी विपत्तियों  को हंस-हंसकर सह लेते हैं यहाँ के लोग.लेकिन जब से शिरोमणि कविताय गया है शहर का बड़ा हिस्सा दहशत में रहता है कि कब कहीं से शिरोमणि आ जायेगा और कोई न कोई पहचान निकल कर कवितायेँ सुनाने लग जायेगा. मुझे तो लोग आसानी से डरा देते है “वो देखो शिरोमणि आगया “ . शिरोमणि के घर में कुलजमा साढ़े चार जाने हैं .उसकी माँ ,बड़ा भाई ,भाभी और पांच साल का भतीजा .उसके पिताजी दो साल पहले देह त्याग चुके थे ,तबसे शिरोमणि अपने घर में कवितापाठ नहीं करता है . हाँ अपने मित्रों पर वो अधिकार पूर्वक ये अत्याचार करता है बिना ये विचार किये कि इनके भी बीबी –बच्चे हैं . मैंने गौर किया है इन दिनों उसमें एक स्वाभाविक क़िस्म कि कवियोचित निर्लज्जता और उग्रता का भी विकास हुआ है ,अब ये उन नेताजी कि संगत का असर है या उसकी अपनी तपस्या का परिणाम ये स्पष्ट नहीं हो सका .उसका नया रूप अभी कुछ दिन पहले ही सामने आया , मैं ये प्रसंग आपको सिलसिलेवार सुनाऊँगा तो आप बेहतर समझ सकेंगे .दरअसल ये पिछले रविवार कि बात है , शाम के करीब छः बज रहे होंगे अब चूंकि दिसंबर में छः बजे अँधेरा भी हो जाता है और ठण्ड भी .तो मैं, बनबारी पंडितजी,अशोक बाबू और राधेश्याम वकीलसाब स्टे्टबैंक के सामने वाली चाय कि दूकान पर चाय पी रहे थे.मैं,बनबारी पंडितजी और अशोक बाबू तो खैर लगभग नियमित रूप से यहाँ आया करते थे पर राधेश्याम बकीलसाब पिछले कुछ सालों से जबलपुर शिफ्ट हो गए थे. वकालात तो उनकी न यहाँ चलती थी न जबलपुर में, वो तो ससुर कुछ बीमार से रहते थे उनके कोई बेटा न था ,बस दोनों दामादों को ही बेटा मान लिया था .बड़ा दामाद तो शुरू से ही जबलपुर में रहता था जब से ससुर ज्यादा बीमार हुए इनकी पत्नी भी जबलपुर शिफ्ट होने पर ज़ोर देने लगीं ,आख़िर सवाल बीच शहर में बने सत्तर बाई पैंतीस के मकान और गाँव कि साढ़े बाईस बीघा जमीन का जो था. सो निश्चिन्त भविष्य ने वकील साब में साहित्यिक रुचियां भी विकसित कर दीं थी ,उन्हीं का बखान वे पिछले डेढ़ घंटे से कर रहे थे ,और हम तीनों कि तो मेजवान कि सी हैसीयत हो गयी थी सो जबरन मुस्कुराते हुए सुन रहे थे [जैसे एक शिरोमणि काफी नहीं था ].तभी एक अवसर कि तरह सामने से शिरोमणि आता दिखा मुझे ,उसे देखकर हम तीनो [मेरे,बनबारी पंडितजी और अशोकबाबू]के मन में राधेश्याम वकीलसाब से बदला लेने की बड़ी तीव्र इच्छा बलवती हुई और एक षडयंत्र के तहत हमने अपनी उपस्थिति मुखर कर दी ताकी शिरोमणि भूल से भी हमें अनदेखा न कर दे. किसी मुंहमांगी मुराद कि तरह शिरोमणि हमारी ओर आगया .हालांकि वह ये समझने कि असफल कोशिश ज़रूर कर रहा था कि आज हम लोग अपनी पृकृति के विरुद्ध आचरण क्यों कर रहे थे ,हमें तो अबतक यहाँ से हवा हो चुकना चाहिए था .खैर हमने बड़ी गर्मजोशी से उसके किये एक चाय का आर्डर दिया तो चाय वाला भी हमें मुंह खोलकर टापने लगा ,पर अब ये समय हमारी योजना के कार्यान्वन का था सो हमने राधेश्याम वकीलसाब का परिचय शिरोमणि से करवाया एक साहित्यप्रेमी के रूप में .इस दौरान मैंने शिरोमणि कि आँखों में एक वहसी चमक कोंधती देखी .अब हमने एक-एक कर के वहां से निकलना शुरू किया और पांच मिनट में ही मैं,बनबारी पंडितजी और अशोक बाबू वहां से निकल गए राधेश्याम वकीलसाब को शिरोमणि के हवाले करके .दो गली दूर हम लोग एक दूसरी चाय की दुकान पर खड़े हो गये और ये अंदाजा लगाने कि कोशिश करने लगे कि अब राधेश्याम वकीलसाब किस हाल में होंगे .लगभग बीस मिनिट बाद ही वकील साब बदहवास  से भागते हुए उसी ओर आ रहे थे . ऐसा लग रहा था जैसे अभी - अभी किसी से [शायद शिरोमणि से ]गुत्थम-गुत्था हुए है , लगता है  हालत ज्यादा ही संजीदा हो लिए थे . "अबे किस जनम का बदला लिया है तुम लोगों ने मुझसे ,किस पागल के चक्कर में फंसा दिया ".हालाँकि वकील साब कि हालत गंभीर थी ,पर क्या हुआ होगा उसकी कल्पना कर के हमारी हंसी ही नहीं रुक रही थी .तभी हमें शिरोमणि हमारी ही ओर आता दिखा ,हमारी सिट्टी-पिट्टी  गुम हो गयी ,जिसको जहां रास्ता दिखा उस ओर भाग लिया .                                  
लेखक :-मनोज सिंह जादौन
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रजनीकांत के ज़ोक्स










नीयत

                                                               

“बाबूजी लेना कितनी है ये तो बताइये ?”सब्जीवाला मुझे मनाता सा बोला.
 “पहले भाव ठीक से बताओ नहीं तो मै किसी और से ले लूँगा.” मैंने कहा.
 “बाबूजी मटर भी तो देखिए बिलकुल हरी और बड़े दानों से भरी मटर है इसीलिए थोड़ी महंगी है” वो मुझे कन्विंस करने की कोशिश करने लगा.
 “अच्छा तो तुम्हारे हिसाब से बाक़ी लोग छिलके बेच रहे हैं”,
 “नहीं बाबूजी मेरे कहने का ये मतलब नहीं है,पर मेरी मटर अच्छी है और मेरी तौल पूरी है इसीलिए मेरी सब सब्जियां कुछ मंहगी है.” सब्जीवाले ने मुझे फिर समझाना चाहा.
मैंने प्रतिवाद किया “हाँ...हाँ..हरिश्चंदर तो बस तू ही है,ला एक किलो तौल दे,और धनिया भी डाल दियो.”
 “जी बाबूजी ही..ही..ही..” खीसें निपोरता हुआ वह सब्जीवाला मटर तौलने लगा.
                   महीनों से मैं इस सब्जी मंडी से सब्जियां ले जाता हूं .लेकिन इनमे से किसी का नाम मैं नहीं जानता हूं न ही शायद ये मेरा नाम जानते है ,लेकिन एकदूसरे को पहचानते बखूबी हैं.महीनों से चलती इस खरीद फरोख्त में ये मोलभाव एक साझा तत्व है . ये पूर्वाग्रह भी पूरे यकीन से मुझमे मौज़ूद था कि थोड़ी बहुत बेईमानी तो सब सब्जीवाले करते ही हैं ,इसलिए मैं मोलभाव कर दाम कम करने की पुरजोर कोशिश करता रहता था.उस दिन भी मैं यही कर रहा था.मैं सब्जी लेकर चल दिया पर आज मैंने निश्चय कर लिया था कि घर जाकर सारी सब्जियां तौलूगा और एक ग्राम भी कम निकलीं तो इन सब्जी वालों कि तो खैर नहीं. नाप-तौल विभाग वालों से शिकायत कर सबकी तराज़ू और बाँट चैक कराऊंगा .एक तो महंगाई वैसे ही आसमान छू रही है कि नौकरी में ईमान को बचा पाना मुश्किल हो रहा है,और ऊपर से ये सब्जीवाले उफ़.तभी मुझे याद आया जनरल स्टोर से भी कुछ सामान लेना है ,अच्छा हुआ रास्ते में ही याद आ गया वर्ना घर पर झंझट हो जाती .सामान कि लिस्ट दुकानदार को देकर मैंने जैसे ही अपनी ज़ेब टटोली दिल धक् से रह गया “मेरा पर्स कहाँ गया?” बेसाख्ता मुंह से निकल गया , दुकानदार ने चौंककर मुझसे पुछा “क्या हुआ भाई साहब?” “अरे मेरा पर्स नहीं मिल रहा है ज़रा देखना ये सामान यहीं रखा है मैं पर्स ढूँढने जा रहा हूं” मैं बदहवास सा वापस भागा ,आख़िर पूरे महीने का वेतन उसी में था .एक मध्यमवर्गीय आदमी के लिए ये बज्रपात ही था कि पूरे महीने की कमाई महीने के शुरुआत में ही गुम जाए ये असहनीय था. अभी मैने सड़क पर नज़र दौड़ना शुरू ही किया था कि मैंने देखा वो सब्जीवाला भागता हुआ मेरी ओर ही आ रहा था .मेरे पास आकर अपनी साँस थामने की कोशिश करने लगा उसका एक हाथ मेरी ओर था जिसमे मेरा पर्स था “बाबूजी ये आपका पर्स , मेरे ठेले के नीचे गिरा पड़ा था.जल्दी से पैसे देख लीजिये पूरे है न.” मैं स्तब्ध खड़ा था “बाबूजी जल्दी कीजिये ,मेरे ठेले पर कोई नहीं है,पड़ौसी से कह के आया हूं.” मै होश मै आया,मैंने कहा "  नहीं गिनने की कोई ज़रुरत नहीं.” मैंने पर्स में से एक पचास का नोट निकल कर उसे देना चाहा ,पर उसने हाथ जोड़ते हुए कहा “ बाबूजी, आप लोगों की दया से संतोष करने लायक कमा लेते है.अच्छा ” वह हाथ जोड़कर वापस चला गया और मै उसे धन्यवाद कहने का साहस न जुटा पाया, शायद मैं शर्मिंदा भी था.मै अपनी आँखों कि गिलावट को रुमाल से छुपाते हुए स्टोर पर जाकर सामान लेने लगा. मैंने तय कर लिय था कि मै घर जाकर सब्जियां तौलकर नहीं देखूँगा.                                                                                                  लेखक:-मनोज सिंह जादौन                                                                                                                      वार्ड नंबर18,सुनहरा रोड़ ,सबलगढ़,जिला-मुरैना (म.प्र.)                                                                                                                               

बुधवार, 15 जनवरी 2014

जीवन के केनवस पर सरिता के साहस का प्रवाह

                                   जीवन के केनवस पर साहस कि सरिता का प्रवाह
                         

               
                इलाहाबाद की सरिता जब चार वर्ष की थी तब वह रक्षाबंधन पर वो अपने मामा के घर औरैया घूमने गयी थी .तब हाई टेंसन लाइन के साथ एक दुर्घटना में उसे दोनों हाथ और एक पैर गंवाने पड़े .कानपुर के एक अस्पताल में उसका तकरीबन दो साल तक ईलाज हुआ . जीवन की सारी आशायें धुल-धूसरित हो चुकी थीं. लेकिन यहाँ से शुरू हुई सरिता द्विवेदी के अदम्य साहस की यात्रा . उसकी माँ ने उसे साहस दिया और पैर की उँगलियों और मुंह की मदद से कागज़ पर कल्पना उकेरना सीखने में सरिता की मदद की.फिर तो जैसे सरिता ने ये साबित करने की ठान ली की मनुष्य की सारी शक्ति उसकी मांसपेसियों में नही बल्कि उसके मन में है .यदि कोई मन में कुछ करने की ठान ले तो शरीर की अपंगता एक गौढ़ वास्तविकता होती है.



               आज सरिता को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है जो लोग राष्ट्रिय स्तर की सूचनाओं से अपडेट है वे सरिता को न सिर्फ़ जानते है बल्कि उससे प्रेरणा भी लेते है.सरिता ने 2005 में राष्ट्रिय बाल पुरस्कार,बेस्ट क्रिएटिव चाइल्ड का राष्ट्रिय पुरूस्कार और मिस्र दूतावास की ओर से आयोजित कला प्रतियोगिता में रज़त पदक हासिल किया.

              इस शारीरिक अपंग लड़की ने आर्थिक अपंग कूड़ा - कचरा बीनने वाले बच्चों के जीवन में रंग भरने का फैसला किया और उन्हें चित्रकला की बारीकियां सिखाई .आज सरिता एलिम्को ,कानपुर में जॉब कर रही है और साथ ही कला के क्षेत्र में अपना नाम रौशन कर रही है. आई.आई.टी.,कानपुर के वार्शिकोत्सव अंतराग्नि में सरिता की प्रदर्शनी को सराहा गया है,पटना में शिल्पोत्सव में उसने मैथिलि चित्रकारी में वाह-वाही हासिल की है. आज इलाहबाद यूनिवर्सिटी की बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट की यह स्टूडेंट हर किसी के लिए प्रेरणा का वायस बनी हुई है . नमन्  भारती नमन्

 (इसे पढ़े और इस लिंक को शेयर कर औरों को भी प्रेरित होने का कारण पेश करें.:-मनोज सिंह जादौन )

             
                

रविवार, 12 जनवरी 2014

सीप के मोती

दोस्तों ,भारतवर्ष कला,संस्कृति ,ज्ञानऔर आध्यात्म में हमेशा से गौरवशाली धरोहर वाला देश रहा है."मेरा भारत महान " कह देना बहुत नहीं होगा ,क्योंकि महान समृद्धि के साथ -साथ रसातली ग़रीबी की अवस्था में भी कलाकारों ने अपनी बेहतरीन कला की बुनाबट ज़ारी रखी.बहरहाल आज में आपके सामने दो बेहतरीन धातु मूर्तिकारों की कला का प्रदर्शन कर रहा हूं .आशा करता हूं आप देखेंगे,सराहेंगे,उनसे संपर्क कर उन्हें प्रोत्साहित करेंगे.








                                                             कुलदीप सोनी (मूर्तिकार)
                                                          kuldeepsony.tkg@gmail.com




                                                                     आकाश सोनी

 ये पोस्ट आपको कैसी लगी ज़रूर बताएं. आपका :-मनोज सिंह जादौन

द अल्केमिस्ट :-चुनिन्दा सन्देश

दोस्तों मैं ये मानता हूं ,कि कुछ रचनाएँ अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर ही करता है,मनुष्य तो उसके हाथ का औजार बन जाता है.क्यों कि कोई कलाकार खुद चाहकर भी उस चमत्कार को दोहरा नहीं पाता . ऐसी ही एक कृति है 'अल्केमिस्ट'.'पाउलो कोएल्हो' ने इस अद्भुत किताब को 1988 में पुर्तगाली भाषा में रचा था,तबसे अबतक 56 भाषाओँ में इसका अनुवाद हो चुका है,कई पीढ़ी इसे पढ़ चुकी है  और अभी सफ़र ज़ारी है.बहरहाल इसकी तारीफ़ में कई पन्नों में कर सकता हूं.ये तो गूंगे का गुड है,इस किताब के कुछ अंश उपरोक्त लिंक पर उपलब्ध हैं .http://www.hindisahityadarpan.in/2014/01/12-quotes-from-the-alchemist-in-hindi.html  
ज़रूर पढ़े 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

स्वेट मार्डेन अंकल की क्लास

                               स्वेट मार्डेन अंकल की क्लास

                   सफलता की रोड़ पर उत्साह की सवारी जरूरी है.  


        शेक्सपियर दादा कहीं लिखते है -"जिस श्रम से हमें आनंद की प्राप्ति होती है , वह हमारी व्याधियों के लिए अमृततुल्य औषधि है , उससे हमारी वेदना शांत होती है."
        दरअसल उत्साहहीन होकर कोई भी कार्य करना उस कार्य को कठिन बना देता है . मनुष्य में उत्साह न हो तो उसकी मानसिक शक्तियों का कार्यो में कोई सहयोग नहीं मिल सकता .हाथ कुछ कार्य कम करता है तो मन कहीं और भटकता है . कुछ देर शरीर के विभिन्न अंग ही परस्पर जूझते रहते है और इस तरह जो कम कुछ मिनटों में हो जाना चाहिए था वह घंटों में खिंच जाता है.इस पर भी कम ढंग से नहीं हो पाता है.उत्साह वो आग है , जो हमारे कार्य-रूपी इंजन को चलाने के लिए भाप तैयार करती है.
        लन्दन के वेस्टमिन्स्टर गिरजे में एक कब्र है, उसकी शिला पर लिखा है -"इसके नीचे इस गिरजाघर को और इस नगर को बनानेवाला क्रिस्टोफ़र रेन विश्राम कर रहा है .वह 90 वर्ष तक जनता कि भलाई के लिए जीवित रहा . यदि आप उसका स्मारक देखना चाहते हो तो अपने चारों ओर देखो ."
       लन्दन में जहां भी आप जायेंगे आपको रेन की कला का नमूना देखने को मिल जायेगा . अब एक रहस्य ,रेन ने कहीं से किसी प्रकार की कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की थी . इसके बाद भी उसने पचपन गिरिजाघर और छत्तीस बड़े-बड़े हॉल और सभागार निर्मित किये है.उसकी कला कौशल का नमूना हैम्पटन और कैसिंग्टन के महलों,टेम्पल बार ,डेटलेन नाट्यघर और रॉयल एक्सचेंज के भवनों में स्पष्ट दिखाई देता है .उसने पूरे पैंतीस वर्ष खर्च करके सेंटपॉल गिरिजाघर का निर्माण किया .यह उसकी सर्वोत्तम कृति है.उसकी सफलता का रहस्य उसका उत्साह था ,जिससे उसे बल प्राप्त होता था .उत्साह ही उसका चिर साथी और सहायक था .
       उत्साह से दीप्त मनुष्य किसी सूर्य का भी सामना कर सकता है . सिकंदर तब युवक ही तो था , जब उसने यूरोपियन सभ्यता को नष्ट करने वालों की धज्जियाँ उड़ा दी थी .नेपोलियन ने कुल पच्चीस वर्ष की उम्र में ही इटली पर विजय प्राप्त कर ली थी . सेम्युअल ने 20 वर्ष की अवस्था में ही रोमन साम्राज्य की स्थापना कर दी थी .न्यूटन इक्कीस वर्ष का भी नहीं था जब उसने अपने सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार किये थे,लूथर इक्कीस वर्ष की अवस्था में ही महान सुधारक बन गया था . इक्कीस वर्ष के चेत्र्स्तान की प्रतिभा का मुकाबला कोई अंग्रेज कवी नहीं कर सका था .विक्टर ह्यूगो ने अपना एक नाटक केवल पंद्रह वर्ष की आयु में ही लिख डाला था .उसने इतनी कम उम्र में तीन महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त किये थे .
      गेलिलियो ने जब अपनी पुस्तक 'गति के नियम' की रचना की थी तो उसकी उम्र लगभग सत्तर वर्ष थी .जेम्सवाट ने 85 वर्ष की आयु में जर्मन भाषा सीखी थी .हम्बोल्ट ने 'काम्सास' नामक ग्रन्थ 90 वर्ष की आयु में समाप्त किया था .पैंतीस वर्ष की आयु में बर्क ने संसद में अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा दिया था .चालीस वर्ष तक गुमनाम रहने के वाला ग्रांट व्यालीस वर्ष की आयु में एक प्रसिद्ध सेनापति बन गया था .एल्वित ने जब कालेज जाने की सोची तब वह 23 वर्ष का था और तीस वर्ष तक वह ग्रजुएट हो गया और उसके पास के कारखाने ने दक्षिणी राज्यों के लिए उज्जवल रस्ते खोल दिए थे.जर्मनी के भाग्य का निर्माण करने वाले 80  वर्षीय विस्मार्क में कितनी अद्भुत शक्ति थी.महाकवि लोंग्फेलो,टेनिसन,ने अपनी उत्तम रचनाएँ 70 वर्ष की आयु के आस-पास ही लिखीं थी.
       अतः उत्साह को कभी मंद न होने दें ,ये तो सफलता विरत सफलता के लिए अति आवश्यक ईंधन है.इसकी कमी से ही हमारी गति में शिथिलता आ जाती है.तो उत्साह के प्रकाश में जीवन की यात्रा करते रहें .यदि आप ऐसा करते है तो तो कभी थकावट न अनुभव होगी .और असफलता दुखदाई प्रतीत न होगी बल्कि एक प्रेरणा लगेगी .
                           दोस्तों ,आज के लिए इतना ही , खुश रहिये उत्साहित रहिये अगली पोस्ट में फिर होगी एसे ही एक नए विषय पर आपसे बात ,तबतक उत्साह का उपयोग कर परिणाम मेरे साथ भी शेयर करें जिससे में उससे औरो का उत्साह वर्धन कर सकूं.और किसी विषय पर मेरी पोस्ट चाहिए तो वह विषय मुझे बताएं में तथ्य परक सूचनाये आप तक पंहुचाऊँगा ये वादा है आपसे .
                                                                                                                         आपका 
                                                                                                               मनोज सिंह जादौन
[मेरी एक संवेदनशील कहानी :-ठिठुरन पढ़े उपरोक्त लिंक पर :-http://www.rachanakar.org/2013/12/blog-post_1828.html
                                                                                                                   
                    
               

नव वर्ष सन्देश

प्रियवर ,
             नववर्ष शुभ वर्ष हो ,सभी सज्जनों की जय हो , दुर्जनों को सदबुद्धी हो .प्रिय मित्रो प्रति सुबह प्रशन्नता दायिनी आशा का आशीष उपलब्ध कराती है,किन्तु हमारा ही बर्तन कुछ दोषयुक्त होता है ,इसलिए दूध फट जाता है और हम दोष देते है दूध वाले को .अतएव आज से ही हम प्रण लेते है कि प्रशन्नता की आशा ही हम दूसरों से न करें अपितु हम ही दूसरों को आशान्वित करने का प्रयाश करेंगे . और नित ये कहेंगे कि 'तुम्हारी भी जय हो हमारी भी जय हो ना तुम हारे ना हम हारे .'पढ़े और खुश रहे लाइकदें या न दें धन्यवाद अवश्य लें .
                                                                                                                                       आपका
                                                                                                                            मनोज सिंह जादौन 
अभिवादन  मित्रो ,
                           आज ही मैंने ये ब्लॉग रचना प्रारंभ की है ,तो सर्वप्रथम अभिवादन , तदन्तर आपसे ये रहस्य भी बाँट रहा हूं कि मै ब्लॉग के बारे में ज्यादा नहीं जानता हूं ,अत: आपका मार्ग दर्शन वांछनीय है. ब्लॉग पर उपस्थित सभी सज्जनों से मिलने को ,उन्हें जानने को मैं अति उत्सुक हूं.अतः अधिक से अधिक लोगों को में अपने ब्लॉग पर आमंत्रित भी कर रहा हूं ,सभी तरह के ब्लॉग रचनाकारों का स्वागत .
                                                                                                                                         आपका
                                                                                                                                 मनोज सिंह जादौन