बुधवार, 15 जनवरी 2014

जीवन के केनवस पर सरिता के साहस का प्रवाह

                                   जीवन के केनवस पर साहस कि सरिता का प्रवाह
                         

               
                इलाहाबाद की सरिता जब चार वर्ष की थी तब वह रक्षाबंधन पर वो अपने मामा के घर औरैया घूमने गयी थी .तब हाई टेंसन लाइन के साथ एक दुर्घटना में उसे दोनों हाथ और एक पैर गंवाने पड़े .कानपुर के एक अस्पताल में उसका तकरीबन दो साल तक ईलाज हुआ . जीवन की सारी आशायें धुल-धूसरित हो चुकी थीं. लेकिन यहाँ से शुरू हुई सरिता द्विवेदी के अदम्य साहस की यात्रा . उसकी माँ ने उसे साहस दिया और पैर की उँगलियों और मुंह की मदद से कागज़ पर कल्पना उकेरना सीखने में सरिता की मदद की.फिर तो जैसे सरिता ने ये साबित करने की ठान ली की मनुष्य की सारी शक्ति उसकी मांसपेसियों में नही बल्कि उसके मन में है .यदि कोई मन में कुछ करने की ठान ले तो शरीर की अपंगता एक गौढ़ वास्तविकता होती है.



               आज सरिता को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है जो लोग राष्ट्रिय स्तर की सूचनाओं से अपडेट है वे सरिता को न सिर्फ़ जानते है बल्कि उससे प्रेरणा भी लेते है.सरिता ने 2005 में राष्ट्रिय बाल पुरस्कार,बेस्ट क्रिएटिव चाइल्ड का राष्ट्रिय पुरूस्कार और मिस्र दूतावास की ओर से आयोजित कला प्रतियोगिता में रज़त पदक हासिल किया.

              इस शारीरिक अपंग लड़की ने आर्थिक अपंग कूड़ा - कचरा बीनने वाले बच्चों के जीवन में रंग भरने का फैसला किया और उन्हें चित्रकला की बारीकियां सिखाई .आज सरिता एलिम्को ,कानपुर में जॉब कर रही है और साथ ही कला के क्षेत्र में अपना नाम रौशन कर रही है. आई.आई.टी.,कानपुर के वार्शिकोत्सव अंतराग्नि में सरिता की प्रदर्शनी को सराहा गया है,पटना में शिल्पोत्सव में उसने मैथिलि चित्रकारी में वाह-वाही हासिल की है. आज इलाहबाद यूनिवर्सिटी की बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट की यह स्टूडेंट हर किसी के लिए प्रेरणा का वायस बनी हुई है . नमन्  भारती नमन्

 (इसे पढ़े और इस लिंक को शेयर कर औरों को भी प्रेरित होने का कारण पेश करें.:-मनोज सिंह जादौन )

             
                

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